दो दिन बाद #जेएनयू की प्रवेश परीक्षा है और ऐसे समय में परीक्षा केंद्र का बदला जाना क्या दर्शाता है? कई छात्र तो अभी भी ऐसे होंगे जिन्हें इसकी जानकारी नहीं होगी कि पेपर से चार दिन पहले परीक्षा केंद्रों में बदलाव किया गया है। #Mphil और #PHD के दोनों पेपर एक दिन होने पर भी परीक्षा के केंद्र, एक ही जगह न रखकर अलग अलग दिए हैं। इसके अलावा जो नए परीक्षा केंद्र दिए गए हैं वे एक दूसरे से इतनी दूरी पर है कि कोई सहज ही वहां नहीं पहुंच पायेगा,इससे उसे पेपर छोड़ना ही पड़ सकता है। इसमें भी दूरी की बात तो ठीक थी परंतु केंद्र भी ऐसे दिये गए हैं जिनका गूगल मैप में नामोनिशान तक नहीं है।अब यदि किसी का पेपर छूट जाता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी, #NTA की या स्वयं #छात्र की?
न जाने क्यों आज ऐसे समय में मुझे #प्रतापनारायण_मिश्र की वो पंक्तियाँ बहुत याद आ रही हैं जिनमें वे कहते हैं कि-
"अभी देखिये क्या दशा देश की हो,
बदलता है रंग आसमा कैसे कैसे।"
बदलता है रंग आसमा कैसे कैसे।"
ये देश की नई सरकार के बनने से सम्बंधित नहीं है, बस मेरे जैसे कुछ युवाओं के भविष्य से सम्बंधित है, जो मेहनत और जद्दोजहद से आगे बढ़ने के लिए संघर्षरत हैं। आज के दौर में जब छात्र को ज्ञान के अलावा कुछ इधर -उधर भी हाथ-पांव चलाने के बाद सफलता हासिल होती है, ऐसे में कुछ मेरे जैसे छात्र जब अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाते है तो कई कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ता है और वह भी इतनी कि वे एकदम निराशावादी बन जाते हैं कि जाने मंजिल मिलेगी भी या नहीं।
#JNU_Admit_card
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