Sunday, August 25, 2019

छबीली



आज का दिन उसके लिए और दिनों से भिन्न था। वह उठती, थोड़ा चल - फिर लेती और आकर बैठ जाती अपनी जगह पर, वही चिरपरिचित प्लास्टिक की टोकरी और कैंचीनुमा कटर उठाये और काटती रहती कुट..कुट..कुट...जैसे टोकरी में पड़े उन रबड़ के ठोस टुकड़ो से वो हल्की परत नहीं, अपने जीवन के स्वप्न काटती जाती हो। लेकिन वह थोड़ी देर बैठ पाती और अचानक फिर उठ कर चल पड़ती। उसका दर्द बढ़ता ही जा रहा था, उसे लगा इस बार जरूर अस्पताल जाना पड़ सकता है लेकिन उसकी सुनेगा कौन? प्रश्न हवा में तैर गया और फिर वह उसी टोकरी को पकड़ कर बैठ गयी।

लड़कियां समझ रहीं थीं मम्मी परेशान हैं, उन्होंने कहा 'मम्मी तुम आराम कर लो इन्हें हम पूरा कर देंगे।' पर उसने आराम करना कभी सीखा ही कहाँ था? जब मायके में थी दौड़ दौड़ कर घर का सारा काम कर दिया करती थी,घर की लाडली बच्ची और उसका नाम छबीली रख दिया गया, असली नाम क्या था उसे खुद मालूम नहीं। यदि स्कूल गयी होती तो जरूर विरोध करती 'ये भी कोई नाम है, मेरा नाम शांति रखो' पर उसने तो कभी स्कूल का दरवाजा तक नहीं देखा था। फिर तब उस समय गांवों में स्कूल हुआ भी कहाँ करते थे, वो भी लड़कियों के लिए! देश आजाद हो गया तो क्या, स्त्रियां तो अभी भी वहीं थी उनकी हालत जैसे पहले थी वैसी ही अब भी। उसकी मां ने उसे वही सिखाया जो उनकी माँ ने उन्हें सिखाया था.. सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और स्वादिष्ट भोजन बनाना.. पराये घर जाकर यही सब तो करना पड़ता है। एकाएक उसकी चेतना लौट आयी, उसने कहा वो ठीक है बस रह रह कर बेचैनी सी उठ जाती है।

ढलती शाम के साथ उसका दर्द भी बढ़ने लगा,उसने किसी को नहीं बताया पर रात होते न होते उसकी शक्ति जैसे जवाब देने लगी, उसने एक ही रट पकड़ ली "बीबी मोय अस्पताल ले चल, अबकी नाय बचूँगी" लेकिन बीबी के हाथ में उसे दिलासा देने के सिवाय कुछ न था, वे बोलती जातीं -"धीरज धर लाली सब ठीक है जायेगो, और बालक तो भये जेउ है जायेगो।" पर उसे धीरज की नहीं अस्पताल और डॉक्टर की आवश्यकता थी।

उसे रह रह का अपने पुराने दिन याद आते जाते और उसका मन पंछी बनकर उड़ जाता उसी समय में जब वह अपने विवाह से खुश थी, खुश थी क्योंकि उसकी बीबी यानी बड़ी बहन और उसका, एक ही घर में विवाह तय हुआ, आखिर विवाह तो उनका होना ही था। माता - पिता भी यह सोचकर संतुष्ट हो गए कि दो तो पार लगीं, यहां संग रहती आयी हैं वहां भी बिना परेशानी के रह लेंगी फिर अलग अलग वर ढूंढने की भागदौड़ और उनके अलग - अलग विवाह का खर्च दोनों बच गए।
✍ . . . . . क्रमशः

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