Thursday, October 10, 2019

भारत, अब भी विकासशील है!

तबाही दूर नहीं, सोने की चिड़िया की

अभी तो कुतरे गए हैं पंख,

आने वाले वक्त में,

खत्म हो जाएंगे जंगल,

दूषित हो जाएंगी नदियां,

फटने लगेंगे कान के पर्दे,

पर आधुनिक मानव,अभी सुविधाएं चाहता है।


भारत, अब भी विकासशील है

सम्भवतः पचास साल बाद भी रहेगा

विकास की 'रेस' में,दौड़ रहा निरन्तर

प्रकृति के दोहन में,जरा पीछे नहीं हटेगा।


खत्म कर दिए जाते हैं,जंगल के जंगल

यहां विकास के नाम पर,

फिर बिछा दी जातीं है सड़कें और पटरियां,

 निर्मित होती जा रहीं गगनचुंबी इमारतें।

लोग नहीं करते परवाह जंगलों की,

पर वे जमीन से खत्म होकर

उग आते हैं उनके अपने भीतर,

जिन्हें काट पाने का  सामर्थ्य 

नहीं जुटा पाते वे अंत तक।


सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां

रोज़ उगलती हैं विषैला जहर,

जो धीरे धीरे घुलता शरीर में

और विकास से पहले ही, आ जाती है मौत।


शायद अर्थ से ही 'अर्थ' का विनाश हो रहा

क्या यहीं रुकेगी ये विनाशलीला,

या ला पटकेगीे हमे उस खण्डहर में,

जहां भावनाएँ दीवारों से कुरेदनी पड़ेगी...!

पृथ्वी की गोद में

बनी रहे साफ स्वच्छ निर्मल धरा हम सभी की ये पृथ्वी हमसे नहीं। हम पृथ्वी से हैं । यह चायनीज वायरस आज अवसर है एक कि जानें हम अपनी सीमाएं तय करे...